the joy of silence
hindi poetry and DIL KI BHADAAS
Monday, October 1, 2012
दिल की कौन सुने फिर
वक़्त वकील हो जाता है
फैसला मजबूरियों का
पत्थर की लकीर हो जाता है
ज़िन्दगी की तकरीरें
आदमी बेदलील हो जाता है
न जले न बुझे दिल
जुगनू में तब्दील हो जाता है
चर्ख उसका चले जो
इश्क कबीर हो जाता है
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